अमरीका क्या सहयोगी कुर्द लड़ाकों को तुर्की के क़हर से बचा पाएगा?

पिछले महीने अमरीका राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ऐलान किया कि सीरिया में चरमपंथी संगठन आईएसआईएस के खिलाफ लड़ रहे अमरीकी सैनिकों को वापस बुलाया जाएगा.

ट्रंप ने यह फैसला सीरिया के पड़ोसी देश और नेटो के अपने सहयोगी राष्ट्र तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तेयेप अर्दोआन से बातचीत के बाद लिया था. मगर इस फैसले के एक महीने से भी कम समय में तुर्की और अमरीका के बीच नया विवाद पैदा हो गया है.

तुर्की ने ऐलान किया है कि वह सीरिया में आईएसआईएस के ख़िलाफ़ बड़ा अभियान छेड़ेगा. मगर आशंका जताई जा रही है कि इसकी आड़ में तुर्की वहां पर मौजूद कुर्द लड़ाकों पर हमले कर सकता है.

चूंकि कुर्द लड़ाकों ने सीरिया में आईएसआईएस के ख़िलाफ़ लड़ाई में अमरीकी सेना का सहयोग किया था, ऐसे में अमरीका तुर्की को चेताया है कि अगर उसने कुर्दों पर हमले किए तो तुर्की को आर्थिक रूप से तबाह कर दिया जाएगा.

एक तरफ़ तुर्की है जो रणनीतिक रूप से अमरीका का अहम सहयोगी है, वहीं दूसरी तरफ़ कुर्द लड़ाके हैं, जिनके बिना अमरीका आईएसआईएस के ख़िलाफ़ जंग में इतनी क़ामयाबी हासिल नहीं कर पाता.

कुर्द लड़ाकों को ट्रेनिंग और हथियार अमरीका से मिले हैं. ऐसे में तुर्की और कुर्द लड़ाकों के बीच संघर्ष छिड़ा तो यह अमरीका के लिए असहज करने वाली स्थिति होगी.

इस स्थिति को कैसे टाला जा सकता है, यह समझने के लिए यह जानना पड़ेगा कि तुर्की क्यों कुर्द लड़ाकों पर हमला करना चाहता है.

तुर्क और कुर्द
एक समय उस्मानी साम्राज्य के केंद्र रहे तुर्की में 20 फ़ीसदी आबादी कुर्दों की है. कुर्द संगठन आरोप लगाते हैं कि उनकी सांस्कृति पहचान को तुर्की में दबाया जा रहा है. ऐसे में कुछ संगठन 1980 के दशक से ही छापामार संघर्ष कर रहे हैं.

अमरीका की डेलावेयर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान कहते हैं कि इस मामले को समझने के लिए इतिहास में जाना होगा.

वह बताते हैं, "तुर्की में दो नस्लीय पहचानें हैं- तुर्क और कुर्द. कुर्द आबादी लगभग 20 प्रतिशत है. पहले वे सांस्कृतिक स्वतंत्रता की मांग कर रहे थे मगर अब कई सालों से वे आज़ादी की मांग कर रहे हैं. वे कुर्दिस्तान बनाना चाहते हैं."

मध्य-पूर्व के नक्शे में नज़र डालें तो तुर्की के दक्षिण-पूर्व, सीरिया के उत्तर-पूर्व, इराक़ के उत्तर-पश्चिम और ईरान के उत्तर पश्चिम में ऐसा हिस्सा है, जहां कुर्द बसते हैं.

कुर्द हैं तो सुन्नी मुस्लिम, मगर उनकी भाषा और संस्कृति अलग है. प्रोफ़ेसर मुक़्तरदर ख़ान बताते हैं कि कुर्द मांग करते है कि संयुक्त राष्ट्र के आत्मनिर्णय के अधिकार पर उन्हें भी अलग कुर्दिस्तान बनाने का हक़ मिले. ध्यान देने वाली बात यह है कि अमरीका ने 2003 में इराक़ पर हमला किया था. तभी से उत्तरी इराक़ में कुर्दिस्तान लगभग स्वतंत्र राष्ट्र की तरह काम कर रहा है.

प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान कहते हैं, "तुर्की इस बात से डरा हुआ है कि कुर्दों का एक राष्ट्र सा लगभग बना हुआ है, ऊपर से कुर्द लड़ाकों को आईएस के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए अमरीका से हथियार भी मिले हैं. हो सकता है कि वे इतने शक्तिशाली हो जाएं कि सीरिया में आईएस से जीते हिस्से को इराक़ के कुर्दिस्तान से जोड़कर बड़ा सा कुर्द राष्ट्र बना लें. ऐसा हुआ तो तुर्की के लिए ख़तरा पैदा हो जाएगा."

तुर्की को यह चिंता पहले भी थी. शुरू में जब आईएस के ख़िलाफ़ अमरीका ने क़ुर्दों से सहयोग लेना चाहा था, तब भी तुर्की ने इसका विरोध किया था. ऐसे में यह आशंका बनी हुई है कि जैसे ही अमरीका सीरिया से अपनी सेनाएं हटाएगा, तुर्की वहां पर कार्रवाई करके कुर्द इलाक़ों को ख़त्म कर देगा और उनके नियंत्रण वाली ज़मीन छीन लेगा.

कौन हैं कुर्द लड़ाके?
तुर्की की चिंता है कि उसके बगल में कुर्द राष्ट्र बना तो उसके लिए अपने यहां रह रही कुर्द आबादी को संभालना मुश्किल हो जाएगा.

यही कारण है कि तुर्की के क़रीबी सहयोगी देश अमरीका ने सीरिया में तथाकथित इस्लामिक स्टेट से लड़ने के लिए वाईपीजी नाम के जिस कुर्द संगठन की सहायता ली, आज वह उसी को खत्म कर देने पर तुला हुआ है.

तुर्की की अंकारा यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर ओमेर अनस बताते हैं कि तुर्की का मानना है कि सीरिया में सक्रिय कुर्द संगठन 'वाईपीजी' उसके यहां चरमपंथी संगठन घोषित किए गए कुर्द अलगाववादी संगठन 'पीकेके' का हिस्सा है.

ओमेर अनस बताते हैं, "पिछले पांच सालों से अमरीका और तुर्की के बीच सीरिया में जिन मुद्दों पर सबसे ज्यादा विरोध बना हुआ है, उनमें सबसे बड़ा मुद्दा वाईपीजी या कुर्द लड़ाके हैं. इन बलों का ताल्लुक सीधे तौर पर पीकेके से है. तुर्की में सक्रिय पीकेके यूरोपीय संघ और अमरीका में भी एक चरमपंथी संगठन के तौर पर दर्ज है. ऊपर से मसला यह है कि सीरिया के कुर्द संगठन वाईपीजी का पीकेके से रिश्ता यदा-कदा ज़ाहिर होता रहता है. उनकी विचारधारा भी पीकेके से मेल खाती है और उनकी अहम लीडरशिप भी पीकेके से आती है."

अमरीकी सीनेटर्स ने भी यह बात मानी है कि जो कुर्द बल सीरिया में अमरीका के सहयोग से आईएस के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं, उनमें बड़ी तादाद उनकी है जो पीकेके से संबंधित रहे हैं ऐसे में यही बड़ा मुद्दा है जिसने तुर्की और अमरीका के बीच खाई पैदा कर दी है.

ओमेर अनस बताते हैं कि कुर्द लड़ाकों को लेकर तुर्की की चिंताएं उस समय चरम पर पहुंच गईं, जब उन्होंने सीरिया में आईएस से छुड़ाए इलाके को अलग देश बनाने की कोशिश की. तुर्की में इस बात को लेकर भी बेचैनी है कि तुर्की के दक्षिणी हिस्से में कुर्द लड़ाके जिस अलग कुर्द देश का गठन करना चाहते हैं, उसे लेकर यूरोपीय संघ और अमरीका स्पष्ट रुख नहीं जता रहे. ऐसे में तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तेयेप अर्दोआन ने 2015 में ही एलान कर दिया था कि वह किसी भी नए देश की स्थापना अपने बगल में नहीं होने देंगे.

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